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प्रभुनाथ सिंह की रिहाई की मांग अब विधानसभा तक पहुँची, स्वास्थ्य और उम्र के आधार पर कानून में बदलाव की उठी सियासी मांग

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पटना: पूर्व सांसद प्रभुनाथ सिंह की रिहाई की मांग अब सोशल मीडिया और राजनीतिक मंचों से निकलकर सीधे बिहार विधानसभा तक पहुँच गई है। महाराजगंज लोकसभा क्षेत्र के गोरेयाकोठी विधानसभा सीट से भाजपा विधायक देवेशकांत सिंह ने विधानसभा सत्र के दौरान इस मुद्दे को उठाकर राज्य की सियासी हलचल को तेज कर दिया है।
विधायक देवेशकांत सिंह ने राज्य के उपमुख्यमंत्री एवं गृह मंत्री सम्राट चौधरी को लिखित रूप में पत्र भेजकर अनुरोध किया है कि स्वास्थ्य और उम्र के कारण प्रभुनाथ सिंह की रिहाई पर विचार किया जाए। पत्र में विधायक ने उल्लेख किया है कि प्रभुनाथ सिंह इस समय 1995 के मशरख डबल मर्डर केस में उम्रकैद की सजा काट रहे हैं और 23 मई 2017 से हजारीबाग सेंट्रल जेल में बंद हैं।
देवेशकांत सिंह ने पत्र में लिखा कि प्रभुनाथ सिंह की उम्र अब लगभग 73 वर्ष हो चुकी है। बढ़ती उम्र के कारण उनकी सेहत पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है और जेल में उन्हें पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध नहीं हो पा रही हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या राज्य सरकार डॉक्टरों की सलाह के आधार पर कानून में संशोधन करके उन्हें स्वास्थ्य कारणों से रिहा करने पर विचार नहीं कर सकती।
राजनीतिक पृष्ठभूमि को देखें तो प्रभुनाथ सिंह राजपूत समाज में मजबूत पकड़ रखते हैं। उनके परिवार में कई राजनीतिक हस्तियां शामिल हैं। उनके भाई केदारनाथ सिंह सारण जिले के बनियापुर विधानसभा सीट से भाजपा विधायक हैं। उनके बड़े बेटे रणधीर कुमार सिंह मांझी विधानसभा सीट से जदयू कोटे से विधायक हैं। वहीं उनके समधी विनय कुमार सिंह सोनपुर विधानसभा सीट से भाजपा विधायक के रूप में कार्यरत हैं।
इस मामले में दिलचस्प तथ्य यह है कि परिवार के अन्य नेताओं की ओर से विधानसभा सत्र के दौरान प्रभुनाथ सिंह की रिहाई की मांग नहीं उठाई गई। यह जिम्मेदारी गोरेयाकोठी विधानसभा सीट से भाजपा विधायक देवेशकांत सिंह ने ली और उन्होंने विधानसभा सचिवालय को पत्र भेजकर कार्य संचालन नियमावली के नियम 78 के तहत तारांकित प्रश्न की सूचना दी, ताकि सरकार से इस विषय में आधिकारिक जवाब लिया जा सके।
विधायक देवेशकांत सिंह का कहना है कि यह केवल एक व्यक्ति की रिहाई का मुद्दा नहीं है। उन्होंने जोर देकर कहा कि स्वास्थ्य के कारण बंदियों की उम्र बढ़ने पर उनके मानवाधिकारों और कानून की आवश्यकताओं के बीच संतुलन बनाए रखना राज्य सरकार की जिम्मेदारी है। उनके अनुसार, अगर प्रभुनाथ सिंह की रिहाई पर विचार किया जाता है, तो यह एक मानवीय निर्णय और न्यायसंगत कदम होगा।
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यह मुद्दा अब सिर्फ व्यक्तिगत रिहाई का नहीं रहा है, बल्कि विधानसभा में उठने के बाद राजनीतिक दबाव, सियासी समीकरण और सामाजिक समर्थन का हिस्सा बन गया है। प्रभुनाथ सिंह की रिहाई की मांग राजपूत समाज और उनके समर्थक नेताओं के बीच भी चर्चा का विषय बन गई है।
संसदीय प्रक्रिया और कानूनी दृष्टि से देखें तो उम्र और स्वास्थ्य पर आधारित रिहाई की प्रक्रिया संवैधानिक और कानूनी जांच के अधीन होती है। विशेषज्ञ बताते हैं कि यदि राज्य सरकार डॉक्टरों की सलाह के आधार पर कानून में संशोधन या रियायत करती है, तो इससे भविष्य में ऐसे मामलों में बंदियों की मानवता और स्वास्थ्य का संरक्षण सुनिश्चित किया जा सकेगा।
इस पूरे मामले ने राज्य की राजनीतिक हलचल को भी प्रभावित किया है। भाजपा विधायक देवेशकांत सिंह द्वारा उठाया गया यह मुद्दा अब विधानसभा के अंदर और बाहर दोनों जगह चर्चा का विषय बन गया है। सरकार के अधिकारी और कानूनी विशेषज्ञ इस विषय पर संवेदनशील बने हुए हैं और संभावना है कि जल्द ही इसका औपचारिक जवाब दिया जाएगा।
समाजशास्त्रियों का मानना है कि इस तरह के मुद्दे केवल राजनीतिक चर्चा तक सीमित नहीं रह जाते, बल्कि वे सामाजिक और कानून व्यवस्था के दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं। अगर स्वास्थ्य के आधार पर रिहाई का निर्णय लिया जाता है, तो यह बंदियों के अधिकारों, न्याय व्यवस्था और राजनीतिक समझौते के बीच संतुलन बनाने का उदाहरण भी बन सकता है।

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